M.P. Board solutions for Class 10 Hindi Kshitij Chapter 1- पद

M.P. Board solutions for Class 10 Hindi Kshitij क्षितिज भाग 2  काव्य खंड

क्षितिज काव्य खंड Chapter 1- पद

पाठ 1 पद – सूरदास

कठिन शब्दार्थ

बड़भागी = भाग्यवान। अपरस = अलिप्त, नीरस, अछूता। तगा = धागा, बंधन। पुरइनि पात = कमल का पत्ता। दागी = दाग, धब्बा। प्रीतिनदी = प्रेम की नदी। पाउँ = पैर। बोस्यौ = डुबोया। परागी = मुग्ध होना (मोहित हो जाना)। गुर चाँटी ज्यौं पागी = जिस प्रकार चींटी गुड़ में लिपटती है, उसी प्रकार हम भी कृष्ण के प्रेम में अनुरक्त हैं। अवधि = समय। अधार = आधार। आवन = आगमन। बिथा = व्यथा, कष्ट। बिरहिनि= वियोग में जीने वाली। बिरह दही = विरह की आग में जल रही हैं। हुती= थीं। गुहारि = रक्षा के लिए पुकारना । जितहिं तैं = जहाँ से। उत = उधर, वहाँ। धार = योग की प्रबल धारा। धीर = धैर्य (धीरता)। मरजादा = मर्यादा, प्रतिष्ठा। न लही = नहीं रही, नहीं रखी। हारिल = हारिल एक पक्षी है जो अपने पैरों में सदैव एक लकड़ी लिए रहता है, उसे छोड़ता नहीं है। नंद-नंदन उर……….. पकरी = नंद के नंदन कृष्ण को हमने भी अपने हृदय में बसाकर कसकर में पकड़ा हुआ है। जक री = रटती रहती हैं, पुकारती रहती हैं। सु = वह। ब्याधि = रोग, पीड़ा पहुँचाने वाली वस्तु, बीमारी। करी = भोगा। तिनहि = उनको। मन चकरी = जिनका मन स्थिर नहीं रहता। मधुकर = भौंरा, उद्धव के लिए गोपियों द्वारा प्रयुक्त संबोधन। हुत = थे। पठाए = भेजा। आगे के = पहले के लोग, प्राचीनकालीन जन। पर हित = दूसरों के हित के लिए। डोलत धाए = घूमते-फिरते थे। पाइहैं = पा लेंगी। अनीति = अन्याय। राज धरम = राजा का धर्म, राजा का कर्त्तव्य।


पद्यांशों की व्याख्या

(1)

ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहते सनेह तगा तें, नाहिन मन अनुरागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूंद न ताकौँ लागी।
प्रीति-नदी मैं पाउँ न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी।
‘सूरदास’अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।
सन्दर्भ – प्रस्तुत ‘पद’ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-2 के पाठ ‘पद’ से लिया गया है। इसके रचयिता वात्सल्य रस के सम्राट ‘सूरदास जी’ हैं।
प्रसंग – प्रस्तुत पद में गोपियों ने उद्धव जी की प्रेम सम्बन्धी उदासीनता पर व्यंग्य करते हुए उन्हें बड़ा भाग्यशाली बतलाया है।
व्याख्या -गोपियाँ उद्धव जी से कहती हैं कि आप तो बहुत भाग्यवान हो जो प्रेम-जाल से सदैव दूर रहे हो। आपके मन में किसी अन्य के प्रति प्रेम भावना नहीं है। अतः आप प्रेम की परिभाषा नहीं जानते हो। जिस प्रकार कमल के फूल की पंखुड़ियाँ जल के पास रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं रही तथा जल की एक बूंद भी उन पर नहीं ठहरती है। अतः पंखुड़ियाँ जल से अछूती रहती हैं। जिस प्रकार तेल में सनी हुई मटकी को जल में भिगोने पर उसके ऊपर जल की एक बूंद भी नहीं ठहरती उसी प्रकार तुम्हारे ऊपर भी कृष्ण के रूप-सौन्दर्य तथा प्रेम का कोई प्रवाह नहीं पड़ा है। सत्यता तो यह है कि आज तक तुमने प्रेम की नदी में अपना पैर तक नहीं डुबोया है इसलिए तुम न तो प्रेम के पारखी हो और न प्रेम की परिभाषा को पहचानते हो। सूरदास बतलाते हैं कि गोपियाँ उद्धव से पुनः कहती हैं कि हे उद्धव! हम तो भोली-भाली अबलाएँ (स्त्रियाँ) हैं। हम कृष्ण के रूप-सौन्दर्य में खोकर लिप्त हैं तथा उन पर मुग्ध हैं। हमारी दशा प्रेमानुरक्त चींटी के समान है। जिस प्रकार चींटी गुड़ खाने के चक्कर में उसमें लिपटकर मर जाती है। ठीक उसी प्रकार हम भी कृष्ण के प्रेम में अनुरक्त हैं।
विशेष-

(1) ‘प्रीति-नदी’ में रूपक अलंकार है।
(2) ‘चाँटी ज्यौं पागी’ में उत्प्रेक्षा अलंकार है।

(3) ‘पुरइनि पात’ में अनुप्रास अलंकार है तथा सम्पूर्ण पद में उपमा अलंकार की छटा दर्शनीय है।
(4) ब्रजभाषा का प्रयोग है जो सरल, सरस तथा साहित्यिक है।
(5) संगीतात्मकता एवं गेयता की प्रधानता है।

(6) चींटी के माध्यम से गोपियों की विरह-दशा वर्णित है।
(7) वियोग शृंगार की प्रधानता है।

(2)

मन की मन ही माँझ रही।
कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।
अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।
अबइन जोगसँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरहदही।
चाहति हुती गुहारि जितर्हि तैं, उत तें धार बही।
‘सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।
सन्दर्भ-प्रस्तुत ‘पद’ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-2 के पाठ ‘पद’ से लिया गया है। इसके रचयिता वात्सल्य रस के सम्राट ‘सूरदास जी’ हैं।
प्रसंग-प्रस्तुत पद में मथुरा से ज्ञान का उपदेश लेकर आने वाले उद्धव जी से गोपियाँ कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को प्रकट
करती हुई कहती हैं कि कृष्ण ने हमारे मन की व्यथा को नहीं समझा है। हमारे मन की बात तो मन में ही रह गई है।
व्याख्या-गोपियाँ कहती हैं कि हे उद्धव जी! अपने प्रिय कृष्ण से मिलन की आशा हमारे मन में ही रहकर धूमिल हो गई है। हमें कृष्ण से यह आशा थी कि वे शीघ्र ही मथुरा से लौटकर आएँगे परन्तु वे नहीं आए। हम सभी अपने मन की बात प्रिय कृष्ण को बतलाना चाहती थीं परन्तु उनके न आने पर अब हम उन बातों को किसके समक्ष प्रकट करें। हमारे प्रिय कृष्ण परसों लौटकर आने की बात कहकर गए थे परन्तु वर्षों बीत जाने पर भी वे लौटकर नहीं आए हैं। हम उनके आने की आशा में समय को आधार बनाकर एक-एक दिन गिनकर व्यतीत कर रही हैं। उनके आने की आशा में हमें अनेक प्रकार की व्यथाएँ अर्थात्
कष्ट सहन करने पड़ रहे हैं। अब तुम्हारे द्वारा योग-ज्ञान के सन्देश को सुनकर हम कृष्ण के विरह में जलने वाली गोपियाँ विरहाग्नि में जलने लगी हैं। जिधर से हम इस विरहाग्नि से रक्षा हेतु पुकारना चाहती थीं उधर से ही यह प्रचंड अग्नि की ज्वाला प्रवाहित हो रही है। अर्थात् आपके ज्ञान-सन्देश हमें विरह की आग में जला रहे हैं।

कवि सूरदास जी लिखते हैं कि गोपियाँ उद्धव जी से कहती हैं कि अब हम किस प्रकार धैर्य धारण करें ? उन्होंने तो यहाँ आपको ज्ञान का सन्देश लेकर और भेज दिया है। उन्होंने तो अपनी सभी मर्यादायों की सीमा को तोड दिया है अब हम अपने मन की बात किससे जाकर कहें?

विशेष-

(1) कृष्ण के प्रति गोपियों के अनन्य प्रेम का चित्रण हैं।

(2) ‘अवधि अधार आस आवन की’ पंक्ति में अनुप्रास अलंकार है।
(3) ‘सुनि-सुनि’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
(4) पद में गेयता एवं संगीतात्मकता विद्यमान है।
(5) भाषा ब्रज है जो सरल, सहज तथा साहित्यिक है।
(6) शब्दों का चयन भावानुकूल किया गया है।
(7) ‘पद’ नामक छन्द है।
(8) वियोग शृंगार रस है।

(3)

हमारे हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ ‘सुर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी॥
सन्दर्भ-प्रस्तुत ‘पद’ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-2 के पाठ ‘पद’ से लिया गया है। इसके रचयिता वात्सल्य रस के सम्राट ‘सूरदास जी’ हैं।
प्रसंग-प्रस्तुत पद में गोपियाँ उद्धव जी से कहती हैं किहमारे कृष्ण तो उस हारिल पक्षी के समान हैं जो कभी लकड़ी से मुक्त नहीं होता है। अत: वे हमें अति प्रिय हैं।

व्याख्या-गोपियाँ कहती हैं कि हे उद्धव! कृष्ण तो हमारे लिए हारिल पक्षी की लकड़ी के समान हैं। जिस प्रकार हारिल पक्षी उठते-बैठते-उड़ते समय अपने पंजों में लकड़ी या तिनका दबाकर रखता है ठीक उसी प्रकार हमने मन, वचन एवं कर्म से नन्द बाबा के बेटे (कृष्ण) को हृदय से दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया है। हम तो सोते-जागते, स्वप्न में, दिन में तथा रात में कृष्ण-कृष्ण की रट लगाए रहती हैं। हे उद्धव जी! तुम्हारे द्वारा दिए जा रहे योग-ज्ञान को सुनकर तो ऐसा लगता है मानो हमने कोई कड़वी ककड़ी खा ली है। तुम तो हमारे लिए एक ऐसा रोग लेकर आ गए हो जिसको हमने न कभी देखा है, न सुना है और न उसका उपभोग किया है।

कवि सूरदास जी लिखते हैं कि गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! यह योग-ज्ञान का सन्देश आप ऐसे लोगों को जाकर दें जिनका मन चकई के समान चंचल एवं चलायमान होता है।
विशेष-

(1) गोपियों ने कृष्ण को कभी अलग न होने वाली हारिल पक्षी की लकड़ी के समान माना है।

(2) ‘सुनत जोग …………………….ककरी’ में उपमा अलंकार है।
(3) कान्ह-कान्ह’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
(4) सम्पूर्ण पद में अनुप्रास की छटा है।
(5) सरल, सहज व साहित्यिक ब्रज भाषा है।
(6) पद में गेयता एवं संगीतात्मकता है।
(7) वियोग श्रृंगार की प्रधानता है।

(4)

हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।
इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।
ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए॥
सन्दर्भ–प्रस्तुत ‘पद’ हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-2 के पाठ ‘पद’ से लिया गया है। इसके रचयिता वात्सल्य रस के सम्राट ‘सूरदास जी’ हैं।
प्रसंग-प्रस्तुत पद में गोपियाँ अपने प्रियतम कृष्ण को बहुत बड़ा राजनीतिज्ञ मानती हैं क्योंकि उन्होंने गोपियों की बात समझे-सुने बिना योग-साधना का सन्देश भेज दिया है।

व्याख्या-एक गोपी अपनी प्रिय सखी से कहती है कि हमारे प्रियतम मथुरा जाकर बहुत बड़े राजनीतिज्ञ हो गए हैं। वे हमारे साथ भी छल-कपट का व्यवहार कर रहे हैं। उन्होंने उद्धव जी के द्वारा हमारे लिए जो योग-सन्देश भेजा है कि गोपियाँ मुझे भूलकर योग-साधना करें। क्या यह सन्देश तुम्हारी समझ में आया है ? अर्थात् क्या यह सन्देश भेजना उचित है ? एक तो कृष्ण पहले से ही बहुत चालाक एवं छलिया थे क्योंकि उन्होंने हम सब को अपने प्रेम-जाल में फंसा लिया था तथा स्वयं हमें विरहाग्नि में तड़पता हुआ छोड़कर मथुरा चले गए। अब तो राजनीति के बड़े-बड़े ग्रन्थों को पढ़कर और भी चालाक हो गए हैं। उन्होंने अपनी विशाल बुद्धि एवं राजनीतिज्ञ होने का परिचय देते हुए हम स्त्रियों को योग-साधना का सन्देश भेजा है। अतः मथुरा की राजनीति में पड़कर अब तो वे अपने-पराए का भेद ही भूल गए हैं। हे सखि ! हमारे पूर्वज बहुत ही परोपकारी एवं सज्जन थे जो दूसरों का हित करने के लिए इधर-उधर भाग-दौड़ करते फिरते थे। इसके विपरीत दूसरी ओर उद्धव रूपी भ्रमर हैं जो हम भोली-भाली अबलाओं को सताने के लिए यहाँ चले आए हैं। अब तो कृष्ण से हम इतनी ही कामना करती हैं कि मथुरा जाते समय वे हमारा मन (दिल) चुराकर ले गए थे, उसे लौटा दें। कृष्ण से हमें ऐसे अनीतिपूर्ण आचरण करने की आशा नहीं थी कि जो हमारी भावनाओं पर कुठाराघात करके तथा नीतिज्ञ होते हुए भी अनीति के मार्ग पर चल रहे हैं। कवि सूरदास जी गोपियों के माध्यम से कहते हैं कि राजा का यह धर्म एवं कर्त्तव्य होता है कि उसकी प्रजा पर कोई अत्याचार न करे। प्रजा के दु:ख को हरसंभव दूर किया जाय परन्तु कृष्ण ने तो अपने सुख-स्वार्थ हेतु कुब्जा से तो प्रेम कर लिया है और हमारे लिए योग का सन्देश भेज दिया है।
विशेष-(1) सम्पूर्ण पद में अनुप्रास अलंकार की प्रधानता है।
(2) वियोग शृंगार रस की प्रधानता है।
(3) पद में गेयता एवं संगीतात्मकता है।

(4) सरल, सहज तथा साहित्यिक ब्रजभाषा है।
(5) कृष्ण को राजनीतिपटु बतलाया गया है।
(6) कवि ने राजधर्म को परिभाषित किया है

(7) ते क्यों ……………..सताऐ’ में लोकोक्ति का प्रयोग है।

अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1. गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में क्या व्यंग्य निहित है?
उत्तर-गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में यह व्यंग्य निहित है कि उद्धव जी कृष्ण के रूप-सौन्दर्य के समीप रहकर भी प्रेम-जाल से दूर हैं जबकि हम उनके प्रेम-जाल में आज भी बँधे हुए हैं।
प्रश्न 2. उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किस से की गई है ?
उत्तर-उद्धव के व्यवहार की तुलना कमल-पुष्प की पंखुड़ियों तथा तेल में सनी हुई मटकी से की गई है। जिस प्रकार कमल-पुष्प की पंखुड़ियाँ तथा तेल में सनी हुई मटकी पर जल एवं उसकी बूंदों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, ठीक उसी प्रकार उद्धव जी पर भी कृष्ण के रूप-सौन्दर्य का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।
प्रश्न 3. गोपियों ने किन-किन उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं ?
उत्तर-गोपियों ने निम्नलिखित उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं-
(1) ‘कमल-पुष्प’ का उदाहरण देकर उद्धव को कृष्ण-प्रेम से विरक्त बतलाया है।
(2) ‘तेल की गागरि’ का उदाहरण देकर उद्धव को कृष्ण प्रेम से विरक्त बतलाया है।
(3) ‘प्रीति-नदी’ का उदाहरण देकर प्रेम-मार्ग से रहित माना है।
(4) मधुकर (भ्रमर) का उदाहरण देकर काले हृदय वाला माना है।
प्रश्न 4. उद्धव द्वारा दिए गए योग के सन्देश ने गोपियों की विरहाग्नि में घी का काम कैसे किया ?
उत्तर-श्रीकृष्ण गोपियों को छोड़कर मथुरा उनके वापस आने की आशा में गोपियाँ कृष्ण की राह देखती रहती थीं। जब कृष्ण उद्धव जी के माध्यम से गोपियों के लिए ज्ञान का सन्देश भेजते हैं तब गोपियाँ अत्यधिक व्याकुल हो जाती हैं और उनकी विरहाग्नि प्रचण्ड हो जाती है। इस प्रकार योग-सन्देश से गोपियों की विरहाग्नि में घी का काम हुआ।
प्रश्न 5. ‘मरजादा न लही’ के माध्यम से कौन-सी मर्यादा न रहने की बात की जा रही है ?

उत्तर-‘मरजादा न लही’ के माध्यम से कृष्ण द्वारा गोपियों के प्रेम की मर्यादा न रखकर उन अबलाओं को ‘योग’ ग्रहण करने की बात कही गई है। गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि जब कृष्ण ने अपनी मर्यादा को स्वयं ही तोड़ दिया है तो हम किस प्रकार धैर्य धारण करें?
प्रश्न 6. कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को गोपियों ने किस प्रकार अभिव्यक्त किया है ?
उत्तर-कृष्ण प्रेम के लिए गोपियाँ उद्धव जी से कहती हैं कि कृष्ण तो हमारे लिये हारिल पक्षी की लकड़ी के समान हैं। हारिल पक्षी की लकड़ी की तरह ही हमने भी कृष्ण को मन, वचन तथा कर्म से पकड़ लिया है। हम तो स्वप्न में, सोते-जागते समय भी कृष्ण-कृष्ण पुकारती रहती हैं। गोपियाँ उद्धव से यह भी कहती हैं कि हम कृष्ण की अनन्य प्रेमिका हैं, परन्तु आपके योग-सन्देशों को सुनकर हमें बहुत दुःख हुआ है।
प्रश्न 7. गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा कैसे लोगों को देने की बात कही है?
उत्तर-गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा ऐसे लोगों को देने की बात कही है जिनके मन चकरी के समान चंचल तथा चलायमान होते हैं। वे कभी किसी देवता को प्रसन्न करते हैं तो कभी किसी अन्य देवता को-
यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी॥
प्रश्न 8. प्रस्तुत पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट करें।
उत्तर-गोपियाँ योग-साधना को बिल्कुल पसन्द नहीं करती हैं। उनके लिए तो योग-साधना का मार्ग अग्नि के समान जलाने वाला तथा दुःख देने वाला है। योग-साधना का सन्देश गोपियों की विरहाग्नि को और अधिक प्रचण्ड कर देता है। उन्हें योग की बातें कड़वी ककड़ी के समान प्रतीत होती हैं।
प्रश्न 9. गोपियों के अनुसार राजा का धर्म क्या होना चाहिए?
उत्तर-गोपियों के अनुसार राजा का धर्म है कि वह अपनी प्रजा पर किसी प्रकार का अत्याचार न होने दे तथा स्वयं भी अत्याचार न करे। प्रजा के प्रत्येक दु:ख को समाप्त कर उसे सुख पहुचाने का प्रयास करे।

राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए॥

प्रश्न 10. गोपियों को कृष्ण में ऐसे कौन से परिवर्तन दिखाई दिये जिनके कारण वे अपना मन वापस या लेने की बात करती है।
उत्तर-गोपियों को कृष्ण में ऐसे अनेक परिवर्तन दिखाई दिए जिनके कारण वे अपना मन वापस लेने की बात कहती हैं; जैसे-
(1) कृष्ण मथुरा में जाकर बहुत बड़े राजनीतिज्ञ बन गए हैं।
(2) उन्होंने उद्धव के माध्यम से हमारे लिए योग-साधना का सन्देश भेजा है।
(3) पहले तो उन्होंने हमें अपने प्रेम-जाल में फंसा लिया और अब योग करने का सन्देश भेज रहे हैं।
(4) कृष्ण राजा होकर भी हमारे ऊपर योग-साधना रूपी अत्याचार कर रहे हैं।
प्रश्न 11. गोपियों ने अपने वाक्चातुर्य के आधार पर ज्ञानी उद्धव को परास्त कर दिया, उनके वाक्चातुर्य की विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर-गोपियों के वाक्चातुर्य की विशेषताएँ इस प्रकार हैं –
(1) गोपियों के वाक्चातुर्य में हास्य तथा व्यंग्य का पुट है।
(2) वे उद्धव के निराकार ब्रह्म के स्थान पर साकार कृष्ण को महत्त्व देती हैं।
(3) गोपियाँ उद्धव को प्रेम की परिभाषा भी न जानने वाला सिद्ध करती हैं।
(4) गोपियाँ उद्धव को प्रेम के बन्धन से दूर रहने के कारण ‘बड़भागी’ कहती हैं।
प्रश्न 12. संकलित पदों को ध्यान में रखते हुए सूर के भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-संकलित पदों को ध्यान में रखते हुए सूर के भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
(1) भ्रमरगीत में गोपियाँ उद्धव जी पर अनेक व्यंग्य-बाण छोड़ती हैं।
(2) गोपियाँ उद्धव को प्रेम की पीर से अनभिज्ञ बतलाती हैं।
(3) वे उद्धव की योग-साधना को कड़वी ककड़ी के समान बतलाती हैं।
(4) गोपियाँ उद्धव के माध्यम से कृष्ण को राजधर्म एवं राजकर्त्तव्य का बोध कराती हैं।

रचना और अभिव्यक्ति
प्रश्न 13. गोपियों ने उद्धव के सामने तरह-तरह के तर्क दिए हैं, आप अपनी कल्पना से और तर्क दीजिए।
उत्तर-उद्धव जी मथुरा से गोपियों के पास योग का सन्देश देने आए थे लेकिन प्रेम-पथ पर चलने वाली गोपियाँ इस सन्देश को किसी भी रूप में अपनाने को तैयार नहीं थीं। हमारी कल्पना से गोपियों के तर्क उचित थे। भला ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो कामधेनु जैसी गाय के दूध का परित्याग करके बकरी का दूध ग्रहण करेगा ? गोपियों के लिए योग मार्ग कड़वी ककड़ी के समान था तथा कृष्ण-प्रेम एक मधुर मिलन एवं सस्वाद था।
प्रश्न 14. उद्धव ज्ञानी थे, नीति की बातें जानते थे; गोपियों के पास ऐसी कौन-सी शक्ति थी जो उनके वाक्चातुर्य में मुखरित हो उठी ?
उत्तर-उद्धव ज्ञानी थे, नीति की बातें जानते थे; गोपियों के पास कृष्ण-प्रेम रूपी ऐसी शक्ति थी जो उनके वाक्चातुर्य में मुखरित हो उठी। गोपियों के समान उद्धव प्रेम की पीर को नहीं समझते थे। वे योग-साधना पर विश्वास करते थे। वे गोपियों से कृष्ण प्रेम छोड़ने की बात कहते तो गोपियाँ व्याकुल होने लगती थीं। गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम चरम सीमा तक पहुँच गया है। वे सोते-जागते, दिन में-रात में-स्वप्न आदि में कृष्ण-कृष्ण ही पुकारती रहती हैं। वे प्रतिक्षण कृष्ण के मथुरा से लौटने की बात जोहती रहती हैं।
प्रश्न 15. गोपियों ने यह क्यों कहा कि हरि अब राजनीति पढ़ आए हैं ? क्या आपको गोपियों के इस कथन का विस्तार समकालीन राजनीति में नजर आता है, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-कृष्ण जब ब्रज क्षेत्र में रहते थे तब वे ग्वालों के साथ खेलते-कूदते थे तथा गोपियों के साथ रासलीला करते थे। जब से कृष्ण मथुरा गए हैं तब से वे अपने सभी सखादि को भूल गए हैं। वहाँ जाकर वे कुब्जा से प्रेम करने लगे हैं। मथुरा में जाकर कृष्ण राजा बन गए हैं तथा राजनीति के बड़े-बड़े ग्रन्थों को पढ़कर वे निपुण राजनीतिज्ञ बन गए हैं। ‘हरि अब राजनीति पढ़ आए हैं’ में गोपियों के कथन का विस्तार समकालीन राजनीति में निश्चित रूप से नजर आता है।