MP Board Class 9th History Chapter 2 : यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति

इतिहास – भारत और समकालीन विश्व-I (History: India and The Contemporary World – I )

Chapter 2 : यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति 

महत्त्वपूर्ण तथ्य

  • ब्रिटेन की सरकार चर्च ऑफ इंग्लैण्ड का समर्थन करती थी।  
  • ऑस्ट्रिया और स्पेन, कैथलिक चर्च के समर्थक थे।
  • उदारवादी समूह सरकार के समक्ष व्यक्ति मात्र के अधिकारों की रक्षा के पक्षधर थे।
  • रैडिकल समूह के लोग महिला मताधिकार आन्दोलन के समर्थक थे।
  • रूढ़िवादी तबका रैडिकल और उदारवादी, दोनों के खिलाफ था।
  • उन्नीसवीं सदी के मध्य तक यूरोप में समाजवाद एक जाना-पहचाना विचार था।
  • समाजवादी निजी सम्पत्ति के विरोधी थे। .
  • इंग्लैण्ड के जाने-माने उद्योगपति रॉबर्ट ओवेन ने इंडियाना (अमेरिका) में नया समन्वय के नाम से एक नये तरह के समुदाय की रचना का प्रयास किया।
  • फ्रांस में लुई ब्लांक चाहते थे कि सरकार पूँजीवादी उद्यमों की जगह सामूहिक उद्यमों को बढ़ावा दे।
  • कार्ल मार्क्स का विचार था कि औद्योगिक समाज ‘पूँजीवादी’ समाज है। मार्क्स को विश्वास था कि पूँजीपतियों के साथ होने वाले संघर्ष में जीत अंततः मजदूरों की होगी। उनकी राय में कम्युनिस्ट समाज ही भविष्य का समाज होगा।
  • 1905 तक ब्रिटेन के समाजवादियों और ट्रेड यूनियन आन्दोलनकारियों ने लेबर पार्टी के नाम से अपनी एक अलग पार्टी बना ली थी।
  • 1914 में रूस और उसके पूरे साम्राज्य पर जार निकोलस II का शासन था।
  • 1917 की अक्टूबर क्रान्ति के जरिए रूस की सत्ता पर समाजवादियों ने कब्जा कर लिया।
  • रूसी साम्राज्य की लगभग 85 प्रतिशत जनता आजीविका के लिए खेती पर निर्भर थी।
  • मार्क्स के विचारों को मानने वाले समाजवादियों ने 1898 में “रूसी सामाजिक लोकतान्त्रिक श्रमिक पार्टी” का गठन किया था।
  • 1914 से 1916 के बीच जर्मनी और ऑस्ट्रिया में रूसी सेनाओं को भारी पराजय झेलनी पड़ी।
  • 1917 तक 70 लाख लोग मारे जा चुके थे।
  • सन् 1917 की सर्दियों में राजधानी पेट्रोगाड की हालत बहुत खराब थी।
  • फरवरी 1917 में राजशाही को गद्दी से हटाने वाली क्रान्ति का झण्डा पेट्रोगाड की जनता के हाथों में था।  
  • अप्रैल 1917 में बोल्शेविकों के निर्वासित नेता ब्लादिमीर लेनिन रूस लौट आए।
  • लेनिन की तीन माँगों को ‘अप्रैल थीसिस’ के नाम से जाना जाता है।
  • 1918-20 में रूस पर सामाजिक क्रान्तिकारियों (‘ग्रीस’) और जार-समर्थकों (‘व्हाइट्स’) का ही नियन्त्रण रहा अर्थात् गृह युद्ध।
  • 1919 में ‘कॉमिन्टर्न’ का गठन हुआ। 1930-33 की खराब फसल के बाद तो सोवियत इतिहास का सबसे बड़ा अकाल पड़ा जिसमें 40 लाख से ज्यादा लोग मारे गए।  
  • रूस जाने वाले भारतीयों में जवाहर लाल नेहरू और रवीन्द्रनाथ टैगोर भी थे जिन्होंने सोवियत समाजवाद के बारे में लिखा भी।

पाठान्त अभ्यास

प्रश्न 1. रूस के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हालात 1905 से पहले कैसे थे ?

उत्तर-1905 से पूर्व रूस की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति-रूस के जार शासक अत्यन्त भ्रष्ट तथा निरंकुश थे। जारों के शासनकाल में रूस का समाज दो मुख्य वर्गों में विभाजित था – कुलीन और जनसाधारण। कुलीन वर्ग में बड़े-बड़े जमींदार और राजकीय अधिकारी सम्मिलित थे। वे धन सम्पन्न होने के कारण बड़ी शान से जीवन-यापन करते थे। उन्हें सभी विशेषाधिकार प्राप्त थे। राज्य के सभी सैनिक तथा असैनिक पदों पर उनकी नियुक्ति होती थी। वे कर भार से भी मुक्त थे। कुलीन वर्ग जनसाधारण वर्ग को हीन दृष्टि से देखता था। किसानों की तरह रूस में श्रमिकों की दशा भी अत्यन्त शोचनीय थी। रूस के पूँजीपति उनका व्यापक शोषण करते थे। कारखानों में उनके साथ बुरा व्यवहार होता था। उन्हें अत्यन्त अल्प वेतन दिया जाता था। मजदूर एक होकर आन्दोलन न करें इसके लिए 1900 ई. में हड़ताल करने व संघ बनाने पर रोक लगा दी गयी।

रूस की राजनीतिक स्थिति -1905 से पहले रूस की राजनीतिक स्थिति चिन्ताजनक थी। रूस के जार पूर्णतया निरंकुश शासक थे। वे अपनी परामर्शदात्री सभाओं के परामर्श की उपेक्षा करते थे। वे अपने गुप्तचरों तथा राजकीय अधिकारों को विशेष महत्व देते थे तथा उनकी सलाह से कार्य करते थे। इसके अतिरिक्त शासन पर भ्रष्ट जमींदारों, शाही परिवार के लोगों, अमीरों तथा सैनिक अधिकारियों का भी प्रभुत्व था। सामन्त तथा अमीर जनता पर घोर अत्याचार करते थे। शासकों तथा शासितों के मध्य गहरा अन्तर था तथा जन असन्तोष की पूर्णतया उपेक्षा की जाती थी।

प्रश्न 2. 1917 से पहले रूस की कामकाजी आबादी यूरोप के बाकी देशों के मुकाबले किन-किन स्तरों पर भिन्न थी?

उत्तर-1917 से पहले रूस की कामकाजी आबादी यूरोप के बाकी देशों के मुकाबले निम्न स्तरों पर भिन्न थी

(1) रूसी साम्राज्य की लगभग 85 प्रतिशत जनता आजीविका के लिए खेती पर निर्भर थी। यूरोप के बाकी देशों में खेती पर आश्रित जनसंख्या का प्रतिशत इतना नहीं था। उदाहरण के तौर पर, फ्रांस और जर्मनी में खेती पर निर्भर आबादी 40-50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं थी। रूसी साम्राज्य के किसान अपनी जरूरतों के साथ-साथ बाजार के लिए भी पैदावार करते थे।

(2) मजदूरों की तरह किसान भी बँटे हुए थे। यहाँ की स्थिति फ्रांस जैसी नहीं थी। मिसाल के तौर पर, फ्रांसीसी क्रान्ति के दौरान ब्रिटनी के किसान न केवल नवाबों का सम्मान करते थे बल्कि नवाबों को बचाने के लिए बाकायदा लड़ाइयाँ भी लड़ीं। इसके विपरीत, रूस के किसान चाहते थे कि नवाबों की जमीन छीनकर किसानों के बीच बाँट दी जाए। बहुधा वह लगान भी नहीं चुकाते थे।

(3) रूसी किसान यूरोप के बाकी किसानों के मुकाबले एक और लिहाज से भी भिन्न थे। यहाँ के किसान समय-समय पर सारी जमीन को अपने कम्यून (मीर) को सौंप देते थे और फिर कम्यून ही प्रत्येक परिवार की जरूरत के हिसाब से किसानों को जमीन बाँटता था।

(4) रूस के अपने उद्योग तो वैसे भी बहुत कम थे, अब तो बाहर से मिलने वाली आपूर्ति भी बन्द हो गई क्योंकि बाल्टिक समुद्र में जिस रास्ते से विदेशी औद्योगिक सामान आते थे उस पर जर्मनी का कब्जा हो चुका था। यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रान्ति 13 था। यूरोप के बाकी देशों के मुकाबले रूस के औद्योगिक उपकरण ज्यादा तेजी से बेकार होने लगे थे। 1916 तक रेलवे लाइनें टूटने लगीं। अच्छी सेहत वाले मर्दो को युद्ध में झोंक दिया गया। देशभर में मजदूरों की कमी पड़ने लगी और जरूरी सामान बनाने वाली छोटी-छोटी वर्कशॉप ठप्प होने लगीं।

प्रश्न 3. 1917 में जार का शासन क्यों खत्म हो गया ?

अथवा

पेट्रोगाड में फरवरी क्रान्ति पर टिप्पणी कीजिए।

उत्तर – फरवरी की क्रान्ति 12 मार्च, 1917 की मानी जाती है, क्योंकि पुराने रूसी पंचांग के अनुसार उस दिन को तारीख 27 फरवरी थी। फरवरी क्रान्ति का प्रारम्भ निम्नलिखित प्रकार से हुआ

(1) 7 मार्च, 1917 के दिन भूखे-प्यासे और शीत से कँपकँपाते निर्धन श्रमिकों ने पेट्रोगाड की सड़कों पर जुलूस निकाला। सड़कों के किनारे के होटलों में घुसकर भोजन किया तथा बाहर निकलकर रोटी के नारे लगाते हुए सड़कों पर घूमने लगे। जार के अधिकारियों ने सैनिकों को गोली चलाने की आज्ञा दी, परन्तु सैनिकों ने नंगे-भूखे मजदूरों पर गोली चलाने से इन्कार कर दिया। इस प्रकार क्रान्ति का सूत्रपात सेना के असहयोग से आरम्भ हो गया।

(2) दूसरे दिन 8 मार्च, 1917 को पेट्रोगाड में नगर के कारखाने में काम करने वाले लगभग एक लाख श्रमिकों ने हड़ताल कर दी तथा सड़कों पर नारे लगाते निकले “रोटी दो, युद्ध बन्द करो, अत्याचारी शासन का अन्त हो।” जार द्वारा मार्च में ही ड्यूमा को भंग कर दिया गया तथा सैनिक मजदूर आन्दोलनकारियों से जा मिले। 13 मार्च को रूस की राजधानी पर मजदूरों ने अधिकार कर लिया। 15 मार्च को जार ने अपना सिंहासन त्याग दिया। इस प्रकार रूस से निरंकुश राजतन्त्र का अन्त हो गया तथा गणतन्त्र की स्थापना की घोषणा की गयी।

प्रश्न 4. दो सूचियाँ बनाइए : एक सूची में फरवरी क्रान्ति की मुख्य घटनाओं और प्रभावों को लिखिए और दूसरी सूची में अक्टूबर क्रान्ति की प्रमुख घटनाओं और प्रभावों को दर्ज कीजिए।

उत्तर

फरवरी क्रान्ति की मुख्य घटनाएँ और प्रभाव प्रमुख घटनाएँ :

22 फरवरी, 1917 को तालाबन्दी की घोषणा – पेट्रोगाड में 22 फरवरी को दाएँ तट पर स्थित एक फैक्ट्री में तालाबन्दी घोषित कर दी गई। अगले दिन इस फैक्ट्री के मजदूरों के समर्थन में पचास फैक्ट्रियों के मजदूरों ने भी हड़ताल का ऐलान कर दिया। बहुत सारे कारखानों में हड़ताल का नेतृत्व औरतें कर रही थीं। इसी दिन को बाद में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस का नाम दिया गया। जब फैशनेबल रिहायशी इलाकों और सरकारी इमारतों को मजदूरों ने घेर लिया तो सरकार ने कप लगा दिया।

2. ड्यूमा को बर्खास्त करना – रविवार 25 फरवरी को सरकार ने ड्यूमा को बर्खास्त कर दिया सरकार के इस फैसले के खिलाफ राजनीतिज्ञ बयान देने लगे। 26 तारीख को प्रदर्शनकारी एकत्र हो गए। 27 तारीख को उन्होंने पुलिस मुख्यालयों पर हमला करके उन्हें तहस-नहस कर दिया। रोटी, तनख्वाह, काम के घण्टों में कमी और लोकतान्त्रिक अधिकारों के पक्ष में नारे लगाते असंख्य लोग सड़कों पर जमा हो गए।

3. पेट्रोगाड सोवियत का जन्म – सरकार ने स्थिति पर नियन्त्रण कायम करने के लिए एक बार फिर घुड़सवार  सैनिकों को तैनात कर दिया। लेकिन घुड़सवार सैनिकों की टुकड़ियों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से मना कर दिया। गुस्साए सिपाहियों ने एक रेजीमेंट की बैरक में अपने ही एक अफसर पर गोली चला दी। तीन दूसरी रेजीमेंटों ने भी बगावत कर दी और हड़ताली मजदूरों के साथ आ मिले। उस शाम को सिपाही और मजदूर एक सोवियत या परिषद्’ का गठन करने के लिए उसी इमारत में जमा हुए जहाँ अब तक ड्यूमा की बैठक हुआ करती थी। यहीं से पेत्रोग्राद सोवियत का जन्म हुआ।

4. जार का राजगद्दी छोड़ना – अगले दिन एक प्रतिनिधिमण्डल जार से मिलने गया। सैनिक कमाण्डरों ने जार को सलाह दी कि वह राजगद्दी छोड़ दे। उसने कमाण्डरों की बात मान ली और 2 मार्च को गद्दी छोड़ दी।

5. झण्डा पेट्रोगाड की जनता के हाथों में – सोवियत और ड्यूमा के नेताओं ने देश का शासन चलाने के लिए एक अन्तरिम सरकार बना ली। तय किया गया कि रूस के भविष्य के बारे में फैसला लेने की जिम्मेदारी संविधान सभा को सौंप दी जाए और उसका चुनाव सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर किया जाए। फरवरी 1917 में राजशाही को गद्दी से हटाने वाली क्रान्ति का झण्डा पेट्रोगाड की जनता के हाथों में था।

अक्टूबर क्रान्ति की प्रमुख घटनाएँ और प्रभाव:

1. सरकार के खिलाफ विद्रोह – जैसे-जैसे अन्तरिम सरकार और बोल्शेविकों के बीच टकराव बढ़ता गया, लेनिन को अन्तरिम सरकार द्वारा तानाशाही थोप देने की आशंका दिखाई देने लगी। सितम्बर में उन्होंने सरकार के खिलाफ विद्रोह के बारे में चर्चा शुरू कर दी। सेना और फैक्ट्री सोवियतों में मौजूद बोल्शेविकों को एकत्र किया गया।

2. सैनिक क्रान्तिकारी समिति का गठन – 16 अक्टूबर, 1917 को लेनिन ने पेट्रोगाड सोवियत और बोल्शेविक पार्टी को सत्ता पर कब्जा करने के लिए राजी कर लिया। सत्ता पर कब्जे के लिए लियॉन ट्राटस्की के नेतृत्व में सोवियत की ओर से एक सैनिक क्रान्तिकारी समिति का गठन किया गया। इस बात का खुलासा नहीं किया गया कि योजना को किस दिन लागू किया जायेगा।

3. बोल्शेविक अखबारों दफ्तरों पर घेरा – 24 अक्टूबर को विद्रोह शुरू हो गया। संकट की आशंका को देखते हुए के प्रधानमन्त्री केरेंस्की टुकड़ियों को एकत्र करने शहर से बाहर चले गए। तड़के ही सरकार के वफादार सैनिकों ने दो बोल्शेविक अखबारों के दफ्तरों पर घेरा डाल दिया।

4. सरकारी कार्यालयों पर कब्जा – टेलीफोन  और टेलीग्राफ दफ्तरों पर नियन्त्रण प्राप्त करने और विंटर पैलेस की रक्षा करने के लिए सरकार समर्थक सैनिकों को रवाना कर दिया गया। पलक झपकते क्रान्तिकारी समिति ने भी अपने समर्थकों को आदेश दे दिया कि सरकारी कार्यालयों पर कब्जा कर लें और मन्त्रियों को गिरफ्तार कर लें।

5. अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस की बैठक  – पूरा शहर क्रान्तिकारी समिति के नियन्त्रण में आ चुका था और मन्त्रियों ने आत्मसमर्पण कर दिया था। पेट्रोगाड में अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस की बैठक हुई जिसमें बहुमत ने बोल्शेविकों की कार्यवाही का समर्थन किया। अन्य शहरों में भी बगावतें होने लगीं। दोनों तरफ से जमकर गोलीबारी हुई, खासतौर से मास्को में, लेकिन दिसम्बर तक मास्को-पेट्रोगाड इलाके पर बोल्शेविकों का नियन्त्रण स्थापित हो चुका था।

प्रश्न 5. बोल्शेविकों ने अक्टूबर क्रान्ति के फौरन बाद कौन-कौन से प्रमुख परिवर्तन किए ?

उत्तर – अक्टूबर क्रान्ति के बाद बोल्शेविकों ने निम्नलिखित प्रमुख परिवर्तन किए

(1) बोल्शेविक निजी सम्पत्ति की व्यवस्था के पूरी तरह खिलाफ थे। ज्यादातर उद्योगों और बैंकों का नवम्बर 1917 में ही राष्ट्रीयकरण किया जा चुका था।

(2) बोल्शेविकों ने जमीन को सामाजिक सम्पत्ति घोषित कर दिया। किसानों को सामन्तों की जमीन पर कब्जा करने की खुली छूट दे दी गई।

(3) शहरों में बोल्शेविकों ने मकान मालिकों के लिए पर्याप्त हिस्सा छोड़कर उनके बड़े मकानों के छोटे-छोटे हिस्से कर दिए ताकि बेघर या जरूरतमंद लोगों को भी रहने की जगह दी जा सके।

(4) उन्होंने अभिजात्य वर्ग द्वारा पुरानी पदवियों के उपयोग पर रोक लगा दी। परिवर्तन को स्पष्ट रूप से सामने लाने के लिए सेना और सरकारी अफसरों की वर्दियाँ बदल दी गईं। इसके लिए 1918 में एक परिधान प्रतियोगिता आयोजित की गई जिसमें सोवियत टोपी (बुदियोनोव्का) का चुनाव किया गया।

(5) बोल्शेविक पार्टी का नाम बदलकर रूसी कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) रख दिया गया। नवम्बर 1917 में बोल्शेविकों ने संविधान सभा के लिए चुनाव कराए लेकिन इन चुनावों में उन्हें बहुमत नहीं मिल पाया।

(6) मार्च 1918 में अन्य राजनीतिक सहयोगियों की असहमति के बावजूद बोल्शेविक ने ब्रेस्ट लिटोव्स्क में जर्मनी से सन्धि कर ली।

(7) गुप्तचर पुलिस (जिसे पहले चेका और बाद में ओजीपीयू तथा एनकेवीडी का नाम दिया गया) बोल्शेविकों की आलोचना करने वालों को दण्डित करती थी।

प्रश्न 6. निम्नलिखित के बारे में संक्षेप में लिखिए

1. कुलक

2. ड्यूमा,

3. 1900 से 1930 के बीच महिला कामगार,

4. उदारवादी,

5. स्तालिन का सामूहिकीकरण कार्यक्रम।

उत्तर-

(1) कुलक – रूस में सम्पन्न किसानों को ‘कुलक’ कहा जाता था।

(2) ड्यूमा – रूसी संसद का विधानमण्डल ‘ड्यूमा’ के नाम से जाना जाता था। 1905 की क्रान्ति के दौरान जार ने एक निर्वाचित परामर्शदाता संसद या ड्यूमा के गठन पर अपनी सहमति दी थी।

(3) 1900 से 1930 के बीच महिला कामगार – फैक्ट्री मजदूरों में औरतों की संख्या 31 प्रतिशत थी लेकिन उन्हें पुरुष मजदूरों के मुकाबले कम वेतन मिलता था। पुरुषों की तनख्वाह के मुकाबले आधे से तीनचौथाई तक वेतन मिलता था। सन् 1917 में बहुत सारे कारखानों में हड़ताल का नेतृत्व महिलाओं ने किया था। महिला कामगार, अक्सर अपने पुरुष सहकर्मियों को प्रेरित करती रहती थीं।

(4) उदारवादी – समाज परिवर्तन के समर्थकों में एक समूह उदारवादियों का था। उदारवादी ऐसा राष्ट्र चाहते थे जिसमें सभी धर्मों को बराबर सम्मान और जगह मिले। उदारवादी समूह वंश-आधारित शासकों की अनियन्त्रित सत्ता के भी विरोधी थे। वे सरकार के समक्ष व्यक्ति मात्र के अधिकारों की रक्षा के पक्षधर थे। उनका कहना था कि सरकार को किसी के अधिकारों का हनन करने या उन्हें छीनने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए। यह समूह प्रतिनिधित्व पर आधारित एक ऐसी निर्वाचित सरकार के पक्ष में था जो शासकों और अफसरों के प्रभाव से मुक्त और सुप्रशिक्षित न्यायपालिका द्वारा स्थापित किए गए कानूनों के अनुसार शासन-कार्य चलाए। पर यह समूह ‘लोकतन्त्रवादी’ नहीं था। ये लोग सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार यानी सभी नागरिकों को वोट का अधिकार देने के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि वोट का अधिकार केवल सम्पत्तिधारियों को ही मिलना चाहिए।

(5) स्तालिन का सामूहिकीकरण कार्यक्रम – नियोजित अर्थव्यवस्था का शुरूआती दौर खेती के सामूहिकीकरण से पैदा हुई तबाही से जुड़ा हुआ था। इसी के बाद स्तालिन का सामूहिकीकरण कार्यक्रम शुरू 1929 से पार्टी ने सभी किसानों को सामूहिक खेतों (कोलखोज) में कार्य करने का आदेश जारी कर दिया। ज्यादातर जमीन और साजो-सामान सामूहिक खेतों के स्वामित्व में सौंप दिए गए। सभी किसान सामूहिक खेतों पर कार्य करते थे और कोलखोज के मुनाफे को सभी किसानों के बीच बाँट दिया जाता था। सामूहिकीकरण का विरोध करने वालों को सख्त सजा दी जाती थी।

अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय

प्रश्न 1. समाजवादी क्रान्तिकारी पार्टी का गठन कब हुआ था ?

(i) 1901,

(ii) 1900,

(iii) 1895,

(iv) 1896.

2. रूस की क्रान्ति कब हुई थी?

(i) 1918,

(ii) 1917

(iii) 1910,

(iv) 1912.

3. सरकार ने ड्यूमा को बर्खास्त किया था

(i) 25 फरवरी, 1917,

(ii) 25 मार्च, 1915,

(iii) 25 अप्रैल, 1914,

(iv) 25 अक्टूबर, 1905.

4. खूनी रविवार की घटना कब हुई?

(i) 1895,

(ii) 1900,

(iii) 1905,

(iv) 1917.

5. रूस की क्रान्ति में निम्नलिखित विचारकों में से किस विचारक के विचारों ने अधिक प्रभावित किया ?

(i) रूसो,

(ii) वाकुनिन,

(ii) कार्ल मार्क्स,

(iv) टॉलस्टाय।

6. रूस में ‘सामूहिकीकरण कार्यक्रम’ को प्रारम्भ किया

(i) स्तालिन,

(ii) ट्राटस्की ,

(iii) गैपाँन,

(iv) लेनिन।

उत्तर-1. (ii), 2. (ii), 3. (i), 4. (iii), 5. (iii), 6. (i)।  

रिक्त स्थान पूर्ति

1. समाज परिवर्तन के समर्थकों में एक समूह ……. का था।

2. कार्ल मार्क्स का विचार था कि औद्योगिक समाज …….समाज है।

3. फरवरी 1917 में राजशाही के पतन और अक्टूबर की घटनाओं को ही ……. कहा जाता है।

4. रूस अनाज का एक बड़ा ……. था।

5. सन् 1917 की सर्दियों में रूस की राजधानी ……. की हालत बहुत खराब थी।

6. प्रथम विश्व युद्ध की शुरूआत ……. में हुई।

उत्तर -1. उदारवादियों, 2. पूँजीवादी, 3. रूसी क्रान्ति, 4. निर्यातक, 5. पेट्रोगाड, 6. 28 जुलाई, 1914

सत्य/असत्य

1. रैडिकल विचारधारा के समर्थक राजतन्त्र की स्थापना चाहते थे।

2. रूढ़िवादी लोग ऐसे लोग कहलाते हैं, जो परिवर्तन का विरोध करते हैं।

3. 1917 की रूसी क्रान्ति को जार क्रान्ति के नाम से पुकारा जाता है। 4. रूस की संसद को ड्यूमा के नाम से जाना जाता था।

5. ‘अप्रैल थीसिस’ का विचार लेनिन ने दिया था।

6. द्वितीय इण्टरनेशनल का सम्बन्ध साम्राज्यवाद से था।

उत्तर-1. असत्य, 2. सत्य, 3. असत्य, 4. सत्य, 5. सत्य, 6. असत्य।

सही जोड़ी मिलाइए

उत्तर-1.→ (ङ), 2.→ (ग), 3. → (घ), 4. → (क), 5. → (ख)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

1. रूस का अन्तिम जार कौन था ?

2. बोल्शेविक दल के सर्वप्रथम नेता कौन थे ?

3. रूस के सन्दर्भ में ‘महिला मताधिकार आन्दोलन’ का समर्थक समूह कौन था ?

4. जार द्वारा कब पद त्याग दिया गया ?

5. सेंट पीटर्सबर्ग का नाम बदलकर क्या कर दिया गया था ?

6. रूस में सीक्रेट पुलिस किस नाम से जानी जाती थी ?

7. खूनी रविवार घटना कब हुई थी?

उत्तर--1. निकोलस द्वितीय, 2. लेनिन, 3. रैडिकल्स, 4. 2 मार्च, 1917,5. पेट्रोगाड, 6. चेका, 7. 1905

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. ‘द्वितीय इण्टरनेशनल’ क्या था ?

उत्तर--1817 का दशक आते-आते समाजवादी विचार पूरे यूरोप में फैल चुके थे। अपने प्रयासों में समन्वय लाने के लिए समाजवादियों ने द्वितीय इण्टरनेशनल के नाम से एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था बनाई थी।

प्रश्न 2. लेबर पार्टी का गठन कब और कहाँ हुआ था ?

उत्तर-1905 में ब्रिटेन के समाजवादियों और ट्रेड यूनियन आन्दोलनकारियों ने लेबर पार्टी के नाम से अपनी एक अलग पार्टी बना ली थी।

प्रश्न 3. खूनी रविवार की घटना क्या थी ?

उत्तर-– 22 जनवरी, 1905 ई. में रविवार के दिन फादर गैपान के नेतृत्व में रूसी क्रान्तिकारियों ने एक जुलूस निकाला था। जार के सैनिकों ने जुलूस के प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलायीं जिससे अनेक क्रान्तिकारी घायल हुए तथा मारे गये। इस कारण ही यह घटना खूनी रविवार के नाम से प्रसिद्ध है।

प्रश्न 4. पहला विश्व युद्ध किसे कहा जाता है ?

उत्तर-1914 में दो यूरोपीय गठबन्धनों के बीच युद्ध छिड़ गया। एक ओर जर्मनी, ऑस्ट्रिया और तुर्की (केन्द्रीय शक्तियाँ) थे तो दूसरी ओर फ्रांस, ब्रिटेन व रूस (बाद में इटली और रूमानिया भी इसमें शामिल हो गए) थे। इसी युद्ध को पहला विश्व युद्ध कहा जाता है।

प्रश्न 5. कोऑपरेटिव क्या था ?

उत्तर- कोऑपरेटिव ऐसे लोगों के समूह थे जो मिलकर चीजें बनाते थे और मुनाफे को प्रत्येक सदस्य द्वारा किए गए काम के हिसाब से आपस में बाँट लेते थे।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. रैडिकल और रूढ़िवादी के बारे में बताइए।

अथवा

रैडिकल और रूढ़िवादी में अन्तर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-– रैडिकल – इन्हें आमूल परिवर्तनवादी भी कहा जाता था। रैडिकल समूह के लोग ऐसी सरकार के पक्ष में थे जो देश की आबादी के बहुमत के समर्थन पर आधारित हो। इनमें से बहुत सारे लोग महिला मताधिकार आन्दोलन के भी समर्थक थे। ये निजी सम्पत्ति के विरोधी नहीं थे। लेकिन केवल कुछ लोगों के पास सम्पत्ति के संकेन्द्रण का विरोध जरूर करते थे। रैडिकल आन्दोलनकारी क्रान्ति के पक्ष में थे।

रूढ़िवादी – रूढ़िवादी आमतौर पर परिवर्तन के विचारों का विरोध करते थे। लेकिन उन्नीसवीं सदी तक आते-आते वे भी मानने लगे थे कि कुछ परिवर्तन आवश्यक हो गया है परन्तु वह चाहते थे कि अतीत का सम्मान किया जाए अर्थात अतीत को पूरी तरह ठुकराया न जाए और बदलाव की प्रक्रिया धीमी हो।

प्रश्न : कार्ल मार्क्स कौन था ?

अथवा

1917 की रूसी क्रान्ति लाने में मार्क्स का क्या योगदान था?

उत्तर- कार्ल मार्क्स वह प्रथम विद्वान था जिसने समाजवाद को एक वैज्ञानिक रूप दिया। कार्ल मार्क्स का विचार था कि औद्योगिक समाज ‘पूँजीवादी’ समाज है। फैक्ट्रियों में लगी पूँजी पर पूँजीपतियों का स्वामित्व है और पूँजीपतियों का मुनाफा मजदूरों की मेहनत से पैदा होता है। मार्क्स का विचार था कि जब तक निजी पूँजीपति इसी तरह मुनाफे का संचय करते जाएँगे तब तक मजदूरों की स्थिति में सुधार नहीं हो सकता। अपनी स्थिति में सुधार लाने के लिए श्रमिकों को पूँजीवाद व निजी सम्पत्ति पर आधारित शासन को उखाड़ फेंकना होगा। मार्क्स को विश्वास था कि पूँजीपतियों के साथ होने वाले संघर्ष में जीत अंततः श्रमिकों की ही होगी। उनके विचारों ने रूसी बुद्धिजीवियों तथा क्रान्तिकारियों को विशेष रूप से प्रभावित किया।

प्रश्न 3. “1917 ई. की रूसी क्रान्ति से नयी सभ्यता तथा संस्कृति का जन्म हुआ।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।

उत्तर- यह कथन पूर्णतया सत्य है कि रूसी क्रान्ति से नयी सभ्यता तथा संस्कृति का जन्म हुआ। रूसी – क्रान्ति के कारण निम्नलिखित सभ्यता तथा संस्कृति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन आये

(1) 1917 ई. की रूसी क्रान्ति ने कार्ल मार्क्स की विचारधारा को मान्यता देकर विश्व के श्रमिकों तथा किसानों में जागृति उत्पन्न की।

(2) रूस की क्रान्ति ने केवल राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन लाने पर बल नहीं दिया वरन् आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र में भी परिवर्तन लाने पर बल दिया।

(3) रूसी क्रान्ति ने नियोजित अर्थव्यवस्था की स्थापना की तथा अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन किये।

(4) इस क्रान्ति ने चर्च के प्रभुत्व को समाप्त किया तथा धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना की।

(5) प्रत्येक व्यक्ति को काम देना राज्य का कर्त्तव्य माना जाने लगा तथा कृषकों एवं श्रमिकों को सम्मान दिया जाने लगा।

प्रश्न 4. प्रथम विश्व युद्ध का रूस की क्रान्ति पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर-– प्रथम विश्व युद्ध में रूस इंग्लैण्ड तथा फ्रांस की ओर से युद्ध में सम्मिलित हो गया था। परन्तु पर्याप्त अस्त्र-शस्त्रों व रसद के अभाव के कारण युद्ध में रूसी सेना को अपार हानि हुई। अनुमानतः 20 लाखयूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रान्ति 19 सैनिक युद्ध में मारे गये, असंख्य घायल हुए तथा 20 लाख बन्दी बनाये गये। आर्थिक दशा भी शोचनीय हो गयी थी। जनता में रूस के शासन के प्रति असन्तोष की भावना उत्पन्न हुई जिसने एक क्रान्ति का रूप ले लिया।

प्रश्न 5. रूसी क्रान्ति के समय मार्च 1917 ई. में क्या घटना घटित हुई ?

उत्तर-भूख-प्यास से पीड़ित असहाय श्रमिकों ने मार्च 1917 ई. में पेट्रोगाड की सड़कों पर जुलूस निकाला था। सड़कों के किनारे के होटलों में घुसकर भोजन किया तथा बाहर निकलकर रोटी के नारे लगाते हुए सड़कों पर घूमने लगे। रूस के जार ने अपनी सेना को आदेश दिया कि इन पर गोलियाँ चलायें परन्तु सैनिकों ने आज्ञा का पालन नहीं किया। कुछ काल के पश्चात् कारखानों के श्रमिकों ने हड़ताल कर दी तथा सड़कों पर नारे लगाते निकले “रोटी दो, युद्ध बन्द करो, अत्याचारी शासन का अन्त हो।” जार द्वारा मार्च में ही ड्यूमा को भंग कर दिया गया तथा सैनिक मजदूर आन्दोलनकारियों से जा मिले। 13 मार्च को रूस की राजधानी पर मजदूरों ने अधिकार कर लिया। 15 मार्च को जार ने अपना सिंहासन त्याग दिया। इस प्रकार रूस से निरंकुश राजतन्त्र का अन्त हो गया तथा गणतन्त्र की स्थापना की घोषणा की गयी।

प्रश्न 6. रूसी क्रान्ति की सफलता के कारण बताइए।

उत्तर-रूसी क्रान्ति की सफलता के निम्नलिखित कारण थे

(1) प्रथम विश्व युद्ध के चलते रहने के कारण यूरोपीय राष्ट्र क्रान्ति के दमन में सहयोग नहीं दे पाये।

(2) रूसी क्रान्ति के विरोधियों में परस्पर फूट थी जिसका लाभ क्रान्तिकारियों ने उठाया।

(3) रूस की जनता में जार के शासन के विरुद्ध व्यापक असन्तोष था, अतः क्रान्तिकारियों को व्यापक जन-समर्थन मिला।

(4) रूस का साम्यवादी क्रान्तिकारी दल मुख्यतया कृषकों तथा मजदूरों का दल था। कृषकों तथा मजदूरों का रूसी पूँजीपतियों ने व्यापक शोषण किया था, अतः उन्होंने पूँजीपतियों के विरोधी साम्यवादी दल का समर्थन किया।

(5) साम्यवादियों की सुसंगठित लाल सेना ने पूँजीपतियों की सेनाओं को कुचल दिया था।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. रूसी राज्य-क्रान्ति 1917 के पूर्व रूस की दशा कैसी थी? सविस्तार समझाइए।

अथवा

रूस में क्रान्ति से पूर्व किस प्रकार की अर्थव्यवस्था थी ?

उत्तर-1917 ई. की क्रान्ति के पूर्व रूस की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक दशा निम्नलिखित थी

(1) सामाजिक दशा – रूस विभिन्न जातियों का निवास स्थल था। रूसी, पोल, फिन, आर्मीनियन आदि विभिन्न जातियाँ यहाँ निवास करती थीं। इन जातियों में असन्तोष की भावना थी। मुख्यतया रूसी समाज दो वर्गों में विभाजित था जिनमें पर्याप्त विषमता थी। रूस का प्रथम वर्ग विशेष अधिकारों से युक्त तथा सम्पन्न वर्ग था जो करों से मुक्त था तथा राजकीय उच्च पदों का अधिकारी था। द्वितीय वर्ग अधिकारहीन वर्ग था जिसमें निर्धन, मजदूर, किसान तथा अर्ध-दास थे। इस वर्ग के पास कोई अधिकार नहीं थे। यह वर्ग अत्यन्त दयनीय जीवन व्यतीत कर रहा था।

(2) राजनीतिक दशा – क्रान्ति से पूर्व रूस की राजनीतिक दशा अत्यन्त शोचनीय थी। रूस के शासक जार निरंकुशता के पोषक थे। वे दैवी अधिकार के सिद्धान्त में आस्था रखते थे। रूस में नाम के लिए एक संसद थी, जो ड्यूमा कहलाती थी, परन्तु व्यवहार में यह शक्तिहीन थी। वास्तविक सत्ता का उपयोग जार ही करता था। शासन की आलोचना करने वालों को दण्डित किया जाता था। रूस में सामन्ती प्रथा का भी प्रचलन था। सामन्तों को राज्य से विशेष अधिकार प्रदान किये गये थे। वे स्वेच्छाचारी शासन में ही आस्था रखते थे।

(3) आर्थिक दशा – प्रथम विश्व युद्ध ने रूस की आर्थिक दशा को अत्यधिक शोचनीय बना दिया था। युद्ध के कारण बाल्टिक सागर एवं काले सागर के बन्द हो जाने से रूस पश्चिमी संसार से पृथक् हो गया जिससेउसके व्यापार को गहरा आघात लगा। जार एलक्जेण्डर के काल में रूस में औद्योगीकरण की गति तीव्र हो गयी थी जिससे पूँजीवाद को विशेष प्रोत्साहन मिला था। पूँजीवाद के कारण श्रमिकों की दशा अत्यधिक शोचनीय हो गयी थी, क्योंकि उनसे काम अधिक लिया जाता था परन्तु मजदूरी कम दी जाती थी। मजदूरों के समान ही किसानों की दशा भी अत्यन्त शोचनीय थी। किसानों पर अनेक प्रतिबन्ध लगा दिये गये थे, परिणामस्वरूप अनेक बार कृषक विद्रोह भी हुए।

(4) धार्मिक दशा – रूस में अधिकतर जनता ईसाई धर्म को मानने वाली थी तथा राज्य और चर्च में गहरा सम्बन्ध था। चर्च को राज्य की ओर से मान्यता प्रदान की गयी थी तथा उसके खर्चे के लिये रूसी जनता पर अनेक अनिवार्य कर भी लगा दिये गये थे। पादरियों का दृष्टिकोण संकीर्ण तथा अन्धविश्वासों पर आधारित था। वे राजा के दैवी अधिकार के सिद्धान्त को मान्यता देते थे तथा जनता से कहते थे कि राजा पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि है, अत: उसका विरोध करना ईश्वर का विरोध है।

प्रश्न 2. रूसी क्रान्ति के कारणों का उल्लेख कीजिए।

अथवा

1917 ई. की रूसी क्रान्ति के सामाजिक एवं आर्थिक कारणों को लिखिए।

अथवा

“1917 की रूसी क्रान्ति जार निकोलस द्वितीय के अत्याचारों का परिणाम थी।” इस कथन की व्याख्या करते हुए क्रान्ति के कारण बताइए।

उत्तर- रूसी क्रान्ति के निम्नलिखित कारण थे

(1) निरंकुश राजतन्त्र – रूस में निरंकुश राजतन्त्र था। राज्य के शासक को जार कहा जाता था जो अपने को ईश्वर का प्रतिनिधि कहता था। जार निरंकुशता को बनाये रखना अपना कर्त्तव्य समझता था। उसे मुख्यतया कुलीन वर्ग, सेना, नौकरशाही तथा पादरियों का ही समर्थन प्राप्त था। रूस की शेष जनता उसके विरुद्ध थी, अत: वह निरंकुश राजतन्त्र को समाप्त करना चाहती थी।

(2) कुलीन वर्ग की स्वार्थपरता और विलासिता – फ्रांस के समान ही रूस में भी कुलीन वर्ग विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग था। इस वर्ग के लोग जार की छत्रछाया में रहकर अपनी जागीरों में मनमानी करते थे। वे फ्रांस के कुलीन वर्ग के समान रूस की जनता का शोषण करते थे तथा भोग-विलास का जीवन व्यतीत करते थे।

(3) अल्पसंख्यक जातियों का विद्रोह – रूस में पाल, यहूदी तथा फिन नामक अल्पसंख्यक जातियाँ निवास करती थीं। जार इन जातियों का रूसीकरण करना चाहता था। इन जातियों को रूसी भाषा पढ़ने के लिए बाध्य किया गया तथा उच्च पदों पर केवल रूसियों को ही नियुक्त किया गया था। परिणामस्वरूप अल्पसंख्यक जातियाँ जार के निरंकश शासन की विरोधी हो गयीं।

(4) कृषकों की दयनीय दशा – क्रान्ति से पूर्व रूस एक कृषि प्रधान देश था, परन्तु किसानों की दशा अत्यन्त शोचनीय थी। उन पर अनेक प्रतिबन्ध लगे हुए थे तथा अनेक करों ने उनकी स्थिति को पूर्णतया निर्धन बना दिया था। कृषकों की दयनीय दशा ने उन्हें क्रान्ति की प्रेरणा दी।

(5) श्रमिकों की दयनीय दशा – औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप रूस में अनेक उद्योगों की स्थापना हो गयी थी। विभिन्न उद्योगों में धन लगाकर पूँजीपति अधिक-से-अधिक धन कमाने की चेष्टा कर रहे थे। अधिक-से-अधिक धन कमाने की धुन में वे श्रमिकों का अधिक-से-अधिक शोषण भी करने का प्रयास करते थे। श्रमिकों को जो वेतन दिया जाता था वह बहुत कम होता था, अतः अपनी हीन दशा को ठीक करने के लिए जब उन्होंने 1900 ई. में श्रमिक संघ बनाने का प्रयास किया तो जार सरकार ने रोक दिया। परिणामस्वरूप श्रमिक-वर्ग जार विरोधी हो गया।

(6) प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेना – रूस का जार साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का था, अतः उसने रूस को प्रथम विश्व युद्ध में उलझा दिया था। युद्ध स्थल पर रूसी सेनाएँ बुरी तरह पराजित हुईं तथा लगभग 6,00,000 सैनिक युद्ध में मारे गये। इस युद्ध ने रूस की आर्थिक दशा को भी शोचनीय बना दिया। सैनिक क्षति तथा आर्थिक संकट के कारण रूसी जनता रूसी सरकार के विरुद्ध भड़क उठी।

प्रश्न 3. रूसी क्रान्ति के प्रभावों को स्पष्ट कीजिए।

अथवा

रूस की क्रान्ति का विश्व की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा? क्या आज भी वह प्रभाव बना हुआ है ? समझाइए।

अथवा

रूस की क्रान्ति ने किस प्रकार रूस में पूर्ण परिवर्तन ला दिया ? विस्तृत वर्णन कीजिए।

अथवा

रूस की क्रान्ति के ऐतिहासिक महत्व को बताते हुए यह स्पष्ट कीजिए कि उसका विश्व पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर– रूसी क्रान्ति के महत्व तथा परिणामों का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में किया जा सकता है

(1) व्यापक क्षेत्रों को प्रभावित करना – 1917 ई. की रूसी क्रान्ति व्यापक क्षेत्रों को प्रभावित करने वाली क्रान्ति थी। इस क्रान्ति ने न केवल राजनीतिक क्षेत्र को प्रभावित किया वरन आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों को भी प्रभावित किया। अभी तक इंग्लैण्ड और फ्रांस में होने वाली क्रान्तियों ने केवल राजनीतिक क्षेत्र में ही परिवर्तन किये थे तथा उनके सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में कोई परिवर्तन नहीं आया था।

(2) निरंकुश शासन की समाप्ति – रूस की क्रान्ति की सर्वप्रमुख उपलब्धि थी-जार के निरंकुश शासन की पूर्णतया समाप्ति । इस क्रान्ति के परिणामस्वरूप ही रूस में युगों से चले आ रहे निरंकुश स्वेच्छाचारी निरंकुश शासन की समाप्ति हुई तथा उसके स्थान पर कृषकों व श्रमिकों के नवीन साम्यवादी शासन की स्थापना हुई।

(3) पूँजीवादी तथा सामन्ती व्यवस्था का समाप्त होना – इस क्रान्ति के परिणामस्वरूप रूस में पूँजीवादी तथा सामन्ती व्यवस्था का अन्त हो गया। उत्पादन के साधनों पर स्थापित निजी स्वामित्व को पूर्णतया समाप्त कर दिया गया तथा कृषि, उद्योगों तथा व्यापार आदि पर राज्य का नियन्त्रण स्थापित कर दिया गया।

(4) विश्व में प्रथम समाजवादी समाज की स्थापना – रूसी क्रान्ति के परिणामस्वरूप जार का असमानता पर आधारित साम्राज्य राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्र में समानता पर आधारित हो गया। “प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार काम और प्रत्येक को उसके काम के अनुसार पारिश्रमिक” रूस का एक आदर्श बन गया।

(5) आधुनिकीकरण की प्रक्रिया का तीव्र होना – जार के शासनकाल में रूस की जनता निरक्षरता, अन्धविश्वास तथा परम्पराओं से ग्रस्त थी। परन्तु 1917 ई. की क्रान्ति के पश्चात् रूस में शिक्षा का व्यापक प्रसार किया गया जिससे आम जनता के अन्धविश्वासों को गहरा आघात लगा। शिक्षा ने जनता के दृष्टिकोण को वैज्ञानिक बनाकर रूस में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ की।

(6) अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी आन्दोलनों का विस्तार – यूरोप के अनेक देशों में समाजवादी दलों की स्थापना हो चुकी थी। ये दल अपने देशों में समाजवाद का प्रचार करते थे, परन्तु इन दलों को विशेष प्रोत्साहन रूसी क्रान्ति ने ही दिया। रूस ने भी कार्ल मार्क्स के समाजवादी विचारों का प्रसार यूरोप में ही नहीं एशिया में भी किया था। अनेक देशों में समाजवादी सरकारों की स्थापना भी हुई।

प्रश्न 4. 1917 की रूसी राज्य क्रान्ति की सफलता के कारणों का वर्णन कीजिए। उत्तर-रूसी क्रान्ति की सफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

(1) प्रथम विश्व युद्ध – इतिहासकारों के अनुसार रूसी क्रान्ति की सफलता का प्रमुख कारण प्रथम विश्व युद्ध था। प्रथम विश्व युद्ध में रूसी सेनाएँ पराजित हो रही थीं। रूस के सैनिक भुखमरी और कष्टों के शिकार हो गये थे। रूस की जनता तथा सैनिक इस परिस्थिति का उत्तरदायी जार को मानते थे। जिस समय रूस के क्रान्तिकारियों ने युद्ध बन्द करने का नारा लगाया तो रूस की सेना व जनता जार के विरुद्ध क्रान्तिकारियों को सहयोग देने लगी।

(2) जार का अत्याचारी तथा निरंकुश शासन – रूस के जार का शासन अत्यधिक निरंकुश व अत्याचारी था। अतः इस निरंकुश व अत्याचारी शासन को समाप्त करने के लिए भी रूसी जनता ने क्रान्तिकारियों को दिल से सहयोग दिया।

(3) यूरोपियन राष्ट्रों का युद्ध में संलग्न होना – इस समय अधिकांश यूरोपीय राष्ट्र युद्ध में उलझे हुए थे, अतः वे रूस की क्रान्ति में हस्तक्षेप नहीं कर पाये ऐसी दशा में जार अकेला पड़ गया और वह क्रान्ति को असफल नहीं कर सका।

(4) कृषकों तथा श्रमिकों में परस्पर सहयोग की भावना – जार ने कृषकों तथा श्रमिकों दोनों का ही अपार शोषण किया था, अतः वे साम्यवादी दल के सदस्य हो गये थे। कृषकों तथा श्रमिकों दोनों ने ही पूँजीवाद को समाप्त करने के लिए क्रान्तिकारी साम्यवादियों को दिल से सहयोग दिया।

(5) क्रान्ति विरोधियों में मतभेद – रूस की क्रान्ति का विरोध करने वालों में भी परस्पर मतभेद की भावना थी, अत: वे क्रान्ति का विरोध उचित ढंग से नहीं कर पाये।

(6) कुशल नेतृत्व – रूसी क्रान्ति को कुशल नेतृत्व प्राप्त था। ट्राटस्की तथा लेनिन ने अत्यन्त कुशलता तथा साहस के साथ क्रान्ति का नेतृत्व किया था। रूस की अधिकांश जनता लेनिन में अपूर्व निष्ठा तथा आस्था रखती थी। लेनिन ने बड़ी सफलता के साथ जनता को संगठित कर जार के विरुद्ध क्रान्ति आरम्भ कर दी थी।

(7) मार्क्स की विचारधारा का प्रभाव – कार्ल मार्क्स की राजनीतिक विचारधाराओं ने रूस की जनता को विशेष रूप से प्रभावित किया था। वास्तव में रूसी क्रान्ति मार्क्स के क्रान्तिकारी सिद्धान्तों पर ही आधारित थी। अतः क्रान्ति को सफल बनाने में मार्क्सवादी विचारधारा का विशेष योगदान रहा।

(8) विश्व बन्धुत्व-रूसी क्रान्ति के सिद्धान्त विश्व – बन्धुत्व की भावना से प्रेरित थे। रूस की जनता यह समझ चुकी थी कि बोल्शेविक दल जिस व्यवस्था की स्थापना करना चाहता है वह अखिल विश्व के किसानों तथा मजदूरों के हितों से सम्बन्धित है। अतः रूस के किसानों तथा मजदूरों ने क्रान्ति को सहयोग देना अपना परम कर्त्तव्य समझा।