MP Board Class 8th History Chapter 6 :  बुनकर, लोहा बनाने वाले और फैक्ट्री मालिक

म.प्र. बोर्ड कक्षा आठवीं संपूर्ण हल- इतिहास– हमारे अतीत 3 (History: Our Pasts – III)

Chapter 6 : बुनकर, लोहा बनाने वाले और फैक्ट्री मालिक

प्रश्न – अभ्यास (पाठ्यपुस्तक से)

महत्वपूर्ण बिन्दु

  • भारत का विश्व में कपड़ा उत्पादन में मुख्य स्थान था।
  • 16वीं शताब्दी से यूरोप की व्यापारिक कम्पनियाँ यूरोप में बेचने के लिए कपड़े खरीदने लगी थीं।
  • भारतीय कपड़े विदेशों में मस्लिन (मलमल), कैलिकों (कालीकट), शिट्ज (छींट), कोसा, बंडाना (बाँधना) आदि शब्दों से जाने जाते थे।
  • 1764 में जॉन ने स्पिनिंग जैनी तथा 1786 में रिचर्ड आर्कराइट ने वाष्प इंजन का आविष्कार किया।
  • बंगाल के तांती, उत्तर भारत के जुलाहे या मोमिन दक्षिण भारत के साले व कैकोल्लार तथा देवांग समुदाय बुनकरी के लिए प्रसिद्ध थे।
  • भारत में पहली सूती कपड़ा मिल 1854 में बम्बई में स्थापित हुई।
  • भारतीय इस्पात और लौह उद्योग प्रारम्भ से ही काफी विकसित था जिसमें मुख्यतः वुट्ज स्टील अति प्रसिद्ध था।
  • 1904 में दोराब जी टाटा (जमशेदजी टाटा के बड़े बेटे) ने अमेरिकी भू-वैज्ञानिक चार्ल्स वेल्ड ने छत्तीसगढ़ में लोह अयस्क के भंडारों की खोज शुरू की।
  • 1912 में टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (टिस्को) की स्थापना हुई।

महत्वपूर्ण शब्दावली

स्पिनिंग जैली – एक मशीन जिसमें पहिए के साथ कई तकलियाँ एक साथ घूमती हैं। .

औरांग – गोदाम (वहाँ बिक्री के लिए चीजों को जमा करके रखा जाता है।)

धौंकनी – हवा फेंकने का यन्त्र।

महत्वपूर्ण तिथियाँ

1764 -स्पिनिंग जैनी का आविष्कार।

1914 -प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ हुआ।

पाठान्तर्गत प्रश्नोत्तर

पृष्ठ संख्या # 69

प्रश्न 1. आपकी राय में कैलिको अधिनियम का यह नाम ‘कैलिको’ अधिनियम क्यों रखा गया ? इस नाम से | इस बारे में क्या पता चलता है कि कौन से कपड़े पर पाबंदी लगाई जा रही थी?

उत्तर – कालीकट से निकले शब्द ‘कैलिको’ हर तरह के सूती कपड़े को कहा जाता था। 1720 में ब्रिटिश सरकार ने इंग्लैण्ड में छापेदार सूती कपड़े-छींट के लिए एक कानून बनाया जिसका नाम कैलिको अधिनियम रखा गया। इस कानून के तहत इंग्लैण्ड में भारतीय सूती वस्त्र पर प्रतिबंध लगाया गया।

प्रश्न 2. स्रोत 1 और स्रोत 2 को देखें। अर्जी भेजने वालों ने अपनी भुखमरी के लिए किन परिस्थितियों को जिम्मेदार बताया है ?

उत्तर – स्रोत 1 और स्रोत 2 के अध्ययन पर अर्जी भेजने वालों ने अपनी भुखमरी के लिए निम्नलिखित परिस्थितियों को जिम्मेदार बताया है

(1) भारतीय कपड़े का इंग्लैण्ड में निर्यात मुश्किल होता जा रहा था क्योंकि भारतीय कपड़े पर भारी सीमा शुल्क थोप दिये थे। इसकी वजह से हजारों बुनकर बेरोजगार हो गए।

(2) ब्रिटिश और यूरोपीय कम्पनियों ने भारतीय माल खरीदना बंद कर दिया था।

(3) ब्रिटिश धागे की माँग बढ़ने से भारतीय धागा नहीं बिक रहा था।

(4) बुनकरों के पास कोई रोजगार नहीं था।

पृष्ठ संख्या # 75

प्रश्न 3. नवाबों और राजाओं की हार से लौह एवं इस्पात उद्योग कैसे प्रभावित होता था ?

उत्तर – नवाबों और राजाओं की हार के साथ भारत में औपनिवेशिक सरकार का राज हो गया। अब तलवार और कवच में प्रयोग होने वाले उद्योगों का पतन हो गया। भारत में लौह इस्पात पर कई तरह के शुल्क लगा दिये गये थे। भारतीय कारीगर भी इंग्लैण्ड से आयात किये जाने वाले लौह-इस्पात का प्रयोग करने लगे। लौह एवं इस्पात उद्योग को औपनिवेशिक सरकार का संरक्षण न मिलने से यह उद्योग कमजोर होता गया।

पाठान्त प्रश्नोत्तर

आइए कल्पना करें

प्रश्न – कल्पना करें कि आप उन्नीसवीं सदी के आखिर के भारतीय बुनकर हैं। भारतीय फैक्ट्रियों में बने कपड़े बाजार में छाए हुए हैं। ऐसी स्थिति में आप अपनी जिंदगी में क्या बदलाव लाएँगे?

उत्तर – उन्नीसवीं सदी के आखिर के भारतीय बुनकर होने की स्थिति में अपनी जिंदगी में निम्नलिखित बदलाव लाएँगे

(1) हम ऐसे कपड़ों का निर्माण करेंगे जिनका निर्माण मशीन द्वारा नहीं किया जा सकता; जैसे-महीन किनारियों वाली साड़ियाँ, हाथ से बनी कढ़ाई के डिजाइन इत्यादि।

(2) सरकार से बुनकर कला के संरक्षण की बात करेंगे।

(3) बुनकर कला को सिखाने के केन्द्र खोलूँगा जिससे यह विरासत आने वाली पीढ़ियों को भी मिल सके।

प्रश्न 1. यूरोप में किस तरह के कपड़ों की भारी माँग थी?

उत्तर – यूरोप में भारतीय बारीक सूती कपड़ा, मस्लिन (मलमल), शिट्ज (छींट), जामदानी, बंडाना (बाँधना) इत्यादि कपड़ों की भारी माँग थी।

प्रश्न 2. जामदानी क्या है ?

उत्तर – जामदानी एक तरह का बारीक मलमल होता है जिस पर करघे में सजावटी चिह्न बुने जाते हैं। इनका रंग प्रायः स्लेटी और सफेद होता है। आमतौर पर सूती तथा सोने के धागों का इस्तेमाल किया जाता था। बंगाल में स्थित ढाका और संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) स्थित लखनऊ जामदानी बुनाई के सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र थे।

प्रश्न 3. बंडाना क्या है ?

उत्तर – ‘बंडाना’ शब्द का इस्तेमाल गले या सिर पर पहनने वाले चटक रंग के छापेदार गुलबन्द के लिए किया जाता है। यह शब्द हिन्दी के ‘बाँधना’ शब्द से निकला है। बंडाना शैली के कपड़े अधिकांशत: राजस्थान और गुजरात में बनाए जाते हैं।

प्रश्न 4. अगरिया कौन होते हैं ?

उत्तर – मध्य भारत के गाँवों में रहने वाले तथा लोहा बनाने वाले समुदाय के लोग अगरिया समुदाय के होते हैं। ये लोहा गलाने की कला में निपुण हैं।

प्रश्न 5. रिक्त स्थान भरें

(क) अंग्रेजी का शिट्ज शब्द हिन्दी के ………….शब्द से निकला है।

(ख) टीपू की तलवार …………….स्टील से बनी थी।

(ग) भारत का कपड़ा निर्यात …………..सदी में गिरने लगा।

उत्तर – (क) छींट, (ख) वुटज, (ग) उन्नीसवीं।

आइए विचार करें

प्रश्न 6. विभिन्न कपड़ों के नामों से उनके इतिहास के बारे में क्या पता चलता है ?

उत्तर – (1) यूरोप के व्यापारियों ने भारत से आया सूती कपड़ा ईराक के मोसूल शहर में देखा इसी आधार पर वे बारीक बुनाई वाले सभी कपड़ों को मस्लिन (मलमल) कहने लगे।

(2) पुर्तगाल व्यापारियों ने कालीकट (केरल) से खरीदे सूती कपड़े को कैलिको कहा। बाद में हर तरह के सूती कपड़े को कैलिकों कहा जाने लगा।

(3) छापेदार सूती कपड़े को शिट्ज, कोसा और बंडाना कहा जाता था। अंग्रेजी शिट्ज शहर हिन्दी के छींट शब्द से निकला है। छींट रंगीन फूल-पत्ती वाले छोटे छापे के कपड़े को कहा जाता है।

(4) सिर पर या गले में पहनने वाले कपड़े का बंडाना शब्द बाँधना शब्द से निकला है।

प्रश्न 7. इंग्लैण्ड के ऊन और रेशम उत्पादकों ने अठारहवीं सदी की शुरूआत में भारत से आयात होने वाले कपड़े का विरोध क्यों किया था ?

उत्तर – अठारहवीं सदी की शुरुआत तक आते-आते भारतीय कपड़े की लोकप्रियता से बेचैन इंग्लैण्ड के ऊन और रेशम उत्पादकों ने भारतीय कपड़ों के आयात का विरोध किया। क्योंकि इंग्लैण्ड में नये-नये कारखाने खुल रहे थे और अंग्रेज कपड़ा उत्पादक चाहते थे कि पूरे इंग्लैण्ड में केवल उनका कपड़ा ही बिके।

प्रश्न 8. ब्रिटेन में कपास उद्योग के विकास से भारत के कपड़ा उत्पादकों पर किस तरह के प्रभाव पड़े ?

उत्तर – ब्रिटेन में कपास उद्योग के विकास से भारत के कपड़ा उत्पादकों पर कई तरह के असर पड़े।

(1) भारतीय कपड़े को यूरोप और अमरीका के बाजारों में ब्रिटिश उद्योगों में बने कपड़ों से मुकाबला करना पड़ता था।

(2) भारत से इंग्लैण्ड को कपड़े का निर्यात मुश्किल होता जा रहा था क्योंकि ब्रिटिश सरकार में भारत से आने वाले कपड़े पर भारी सीमा शुल्क थोप दिए थे।

(3) इंग्लैण्ड में बने सूती कपड़े की वजह से भारतीय कपड़े अफ्रीका, अमरीका और यूरोप के बाजारों से बाहर हो गए।

(4) भारतीय कपड़ों की माँग कमजोर होने से भारत के कई बुनकर बेरोजगार हो गए।

(5) ब्रिटिश और यूरोपीय कम्पनियों ने भारतीय माल खरीदने बंद कर दिए।

प्रश्न 9. उन्नीसवीं सदी में भारतीय लौह प्रगलन उद्योग का पतन क्यों हुआ?

उत्तर – उन्नीसवीं सदी में भारतीय लौह प्रगलन उद्योग का पतन हो गया जिसके निम्नलिखित कारण थे

(1) औपनिवेशिक सरकार ने आरक्षित वनों में लोगों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी जिससे कोयला बनाने के लिए लकड़ी मिलना मुश्किल हो गया।

(2) कुछ क्षेत्रों में सरकार ने जंगलों में आवाजाही की अनुमति दे दी थी, लेकिन प्रगालकों को अपनी प्रत्येक भट्टी के लिए वन विभाग को भारी कर चुकाना पड़ता था जिससे उनकी आय गिर जाती थी।

(3) उन्नीसवीं सदी के आखिर तक ब्रिटेन से लौह और इस्पात का आयात होने लगा था। सस्ता होने के कारण भारतीय लुहार घरेलू बर्तन व औजार आदि बनाने के लिए आयातित लोहे का इस्तेमाल करने लगे। इसकी वजह से स्थानीय प्रगालकों द्वारा बनाए जा रहे लोहे की माँग कम हो गयी।

प्रश्न 10. भारतीय वस्त्रोद्योग को अपने शुरुआती सालों में किन समस्याओं से जूझना पड़ा?

उत्तर– भारतीय वस्त्रोद्योग को अपने शुरूआती सालों में बहुत-सी समस्याओं से जूझना पड़ा जो कि निम्नलिखित हैं

(1) भारतीय वस्त्रोद्योग को ब्रिटेन से आए सस्ते कपड़े का मुकाबला करना पड़ता था।

(2) अधिकतर सरकारें आयातित वस्तुओं पर सीमा शुल्क लगाकर अपने देश में औद्योगीकरण को बढ़ावा देती थीं। इससे प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाती थी परन्तु औपनिवेशिक भारतीय सरकार ने भारतीय वस्त्रोद्योग को इस तरह की सुरक्षा नहीं दी।

प्रश्न 11. पहले महायुद्ध के दौरान अपना स्टील उत्पादन बढ़ाने में टिस्को को किस बात से मदद मिली ?..

उत्तर- 1914 में पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ। ब्रिटेन में बनने वाले इस्पात को यूरोप में युद्ध सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भेज दिया गया। जिससे भारत आने वाले ब्रिटिश स्टील की मात्रा में भारी गिरावट आई और रेल की पटरियों के लिए भारतीय रेलवे टिस्को पर आश्रित हो गया। जब युद्ध लम्बा खिंच गया तो टिस्को को युद्ध के लिए गोलों के खोल और रेलगाड़ियों के पहिये बनाने का काम भी सौंप दिया गया। 1919 तक स्थिति यह हो गई थी कि टिस्को में बनने वाले 90 प्रतिशत इस्पात को औपनिवेशिक सरकार ही खरीद लेती थी। जैसे-जैसे समय बीता टिस्को समूचे ब्रिटिश साम्राज्य में इस्पात का सबसे बड़ा कारखाना बन चुका था।

आइए करके देखें

प्रश्न 12. जहाँ आप रहते हैं उसके आस-पास प्रचलित किसी हस्तकला का इतिहास पता लगाएं। इसके लिए आप दस्तकारों के समुदाय, उनकी तकनीक में आए बदलावों और उनके बाजारों के बारे में जानकारियाँ इकट्ठा कर सकते हैं। देखें कि पिछले 50 साल के दौरान इन चीजों में किस तरह बदलाव आए हैं ?

उत्तरधातु शिल्प

(1) प्रारम्भ में धातु शिल्प का प्रयोग केवल बर्तनों एवं आभूषणों तक सीमित था।

(2) धातु शिल्प अथवा पीतल व तांबे से अन्य कलात्मक वस्तुएँ देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी बनने लगी हैं।

(3) कारीगर पहले धातु पिघलाने के लिए पारम्परिक भट्टियों का प्रयोग करते थे। परन्तु अब नई इलेक्ट्रोनिक भट्टियों का प्रयोग किया जाता है।

(4) कारीगर धातुओं का उत्पादन स्थानीय माँग के अनुसार ही करते हैं।

(5) पिछले 50 साल के दौरान इन चीजों में बहुत बदलाव आये हैं। विभिन्न प्रकार की मूर्तियाँ, सजावटी सामान इत्यादि की माँग दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है।

प्रश्न 13. भारत के नक्शे पर विभिन्न हस्तकलाओं के अलग-अलग केन्द्रों को चिह्नित करें। पता ल गएँ कि ये केन्द्र कब पैदा हुए ?

उत्तर

भारत के विभिन्न हस्तकला केन्द्र

(1) रेशमी कपड़ों की बुनाई     –     अकबर

(2) जरीदारी              –       19वीं शताब्दी से

(3) संगमरमर           –         मुगल काल से

(4) कालीन                 –     मुगल काल से

(5) सूती वस्त्र            –        मुगल काल से

(6) चिकनकारी         –          320 ई. पू. से

(7) धातु कार्य       –            3000 ई. पू. से

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